This is possibly the largest number of people booked for sedition at one time in one district anywhere in India.

How did this slip below the radar?

Read our >>>

scroll.in/article/944116/10000

Earlier, companies could only give 7.5% of their profits as political donations. Despite opposition from the RBI, the finance ministry pushed through electoral bonds -- a scheme that RBI said leads to black money. @nit_set reports with documents

huffingtonpost.in/entry/rbi-wa

RT @vindugoel@twitter.com

India's ruling BJP said electoral bonds would reveal more about money in elections. Instead, they revealed less. Documents show how the government ignored serious opposition from the central bank and election officials. By @nit_set@twitter.com of @HuffPostIndia@twitter.com huffingtonpost.in/news/paisapo

🐦🔗: twitter.com/vindugoel/status/1

जेएनयू- बाबा नागार्जुन

नवल-नवेलियों का
उन्मुक्त लीला-प्रांगण
यह जेएनयू
असल में कहा जाए तो कह ही डालूँ
बड़ी अच्छी है यह जगह
बहुत ही अच्छी
और क्या कहूँ…

सोचता हूँ मैं भी ले लूँ दाखिला
‘टिब्बेटियन’ लेने पर क्यों कोई एतराज करेगा
डाक्टर विमला प्रसाद
डाक्टर नामवर…
डाक्टर मुजीब…
ये सब तो रिकमेंड करेंगे ही
तब नए सिरे से
उपनयन संस्कार होगा मेरा
छात्रावास में कमरा मिल ही जाएगा
वृत्ति की व्यवस्था तो होगी ही
शाबाश! बेटा अर्जुन नागा

सोचता ही जा रहा हूँ
आखिर क्या रखा है इसमें
दरअसल यह जगह है बड़ी शानदार

Will be missing for a few days. May this community keep growing.

@jnukiladki
It is better to say "unschooled" than "uneducated" - if schooling had been about "education", we wouldn't be in the place we are now. In fact schooling & education are more often than not inverselfy correlated. Also not sure what "immature" means, usually people on the ground, farmers and workers, are the most serious & mature people as they have suffered real life experience. They may lack the urban sophistication of the former, that's perhaps why the perception.

@jnukiladki The LGBT rights movement in the US was very strategic about creating a separate category of "allies" where they put the well-meaning straight people, took their funding and their support, but leadership was always firmly placed in queer hands.

@PJ_KING He can afford pollution masks which cost 200-300. I don't know a single daily wage labourer in Faridabad who can buy that mask. Rich people can also buy air purifier whose cost is equal to a year of earnings of a labourer. Rich people can also go see doctors, a breed that is not visible to poor people in this country.

It's interesting to see the kind of creatures the modern consumerism produces and the mass media encourages. Environmentalists who can't live without air conditioning. Farmers leaders who've never spent a day in the farm. Trade unionists who've never gone to factory. This is the why I find radical dalit politics so interesting. They might be uneducated, or immature but they know that the leadership has to come from the shared experience. A Brahmin how can never understand what they go through.

Pollution control has become another deathbed for poor people. Thousands of daily wage labourers across NCR have been unemployed for 14 days now. Imagine 14 days of no earning for those who live hand to mouth. But who cares?
Rich people only create demand for pollution, they don't actually increase pollution, and even if they do, they are entitled to it. It's funny how rich find a way out of any responsibility at all on any issue.

When we start recommending lists, people to follow, we end up building social capital that is inherently non egalitarian. It becomes an exercise of our privilege, or adding to the privilege of others. How is that egalitarian?

From Iqbal Abhimanyu:

अपनी व्यक्तिगत कहानी लिखने से कतराता हूँ, लेकिन अभी सही वक्त लग रहा है.
मेरे माता-पिता पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता रहे हैं, हालांकि परिवार के अन्य सदस्यो की मदद के कारण आर्थिक तंगी कभी नहीं रही लेकिन बारहवी के बार उच्च शिक्षा के खर्चे का सवाल मुँह बाये खडा था. इंजीनियरिंग करने का मन भी नहीं था और कोचिंग और कालेज की फीस भी रिश्तेदारो की मदद से ही चुकानी पडती. ऐसे में (बाबा) पिता ने कहा जेएनयू या बीएचयू में दाखिला ले लो, मैं कुछ और लेख वगैरह लिखकर तुम्हारी पढाई का खर्च इकट्ठा कर सकता हूँ. जेएनयू में आने के बाद सेमिस्टर में एक ही बार घर से पैसा लेकर आता था, फिर छात्रवृत्ति से काम लगभग चल जाता था. कुछ अन्य खर्चे के लिए दिल्ली-में रहने वाले काका से मदद मिल ही जाती थी. एम ए दूसरे साल तक आते-आते स्पैनिश की ट्यूशन शुरू कर दी (हालांकि घर से पैसा भी आना जारी रहा) और फिर एम फिल के साथ जे आर एफ का इम्तेहान पास कर लिया. आजकल आयकर चुका रहा हूँ और कुछ और छात्रो की मदद की कोशिश भी कर रहा हूँ.

दोहरा देता हूँ कि किसी बडे (महंगे) संस्थान में पढना चाह्ता तो व्यवस्था हो जाती लेकिन एक दबाव जरूर रहता, खुद पर भी और माँ-बाप पर भी. जे एन यू ने अपने पैरो पर खडा किया और हिम्मत दी.

इसके बावजूद मैं अपनी कक्षा के तुलनात्मक रूप से सम्पन्न छात्रो में था: मृगेंद्र, संजीत, Mayuresh Kumar Najmie Safaa, बिकाश जैसे दोस्त बहुत विषम परिस्थितियो में पढे और लगभग सभी छात्र अपने परिवार के फर्स्ट जनरेशन लर्नर्स (परिवार में पहला ग्रैजुएट‌‌) थे. एक जुनियर और अज़ीज़ दोस्त अक्षय यहाँ अपने बडे भाई की प्रेरणा से आया, जोकि स्कियुरिटी गार्ड की नौकरी एक होस्टल में करते थे. एक और जूनियर मंटू (Mantu Kumar) एम ए के लिये जे एन यू में आया लेकिन उसके हालात वैसे भी नहीं थे कि वह यहाँ रहने के खर्च उठा सके, उसे बीच में ही नौकरी करनी पडी.

ये कहानिया कोई अपवाद नहीं हैं, मेरे दो रूममेट ऐसे रहे हैं जो दलित और गरीब पृष्ठभूमि से आए थे और छात्रवृत्ति के आने तक उधार से काम चलाते थे.

पिछडे इलाको के लिये स्पेशल डेप्रिवेशन पाइंट (प्रवेश परीक्षा में बोनस अंक), बारहवी में सिर्फ 45 फीसदी अंको की अर्हता, सभी को छात्रवृत्ति और कम फीस, ऐसे कारण रहे हैं कि जितने गरीब और ग्रामीण इलाको के छात्र आपको जे एन यू में मिलेंगे देश के किसी केंद्रीय संस्थान में नहीं होंगे. सिर्फ मेहनत करके प्रवेश परीक्षा पास करने की चुनौती थी, जो तमाम गैर-बराबरियो के बाद भी कुछ जहीन छात्र कर पाते थे.

इस व्यवस्था पर पिछले कुछ दिनो में चौतरफा प्रहार हुआ है, डेप्रिवेशन पाइंट हटा दिये गये, छात्रवृत्ति या तो नहीं मिल रही है या रुकी हुई है. प्रवेश परीक्षा में अंग्रेजी और ऐसे विषयो के बढावा दिया गया है जो गांव और छोटे शहरो के छात्रो के लिये दुरूह हैं. इंटरव्यू के अंक काफी ज्यादा हैं, इसके कारण एमफिल और पी एच डी के दाखिले में जाति और वर्ग आधारित भेदभाव होने की सम्भावना बढी है और होता भी है.
अब फीस बढाना इस संस्थान के चरित्र को बदलने का आखिरी हथियार है. पहले ही इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के फर्जी कोर्स (न बिल्डिंग, न अध्यापक‌‌‌) बनाकर उंनके छात्रो से मनमानी फीस वसूली जा रही है.

मैं मूलतः जे एन यू जैसे विशिष्ट संस्थानो के खिलाफ हूँ, मैं मानता हूँ कि अच्छी उच्च शिक्षा सबको अपने गांव-शहर में निशुल्क मिलनी चाहिये. और उसका जुडाव स्थानीय मुद्दो और लोगो से होना चाहिये.

लेकिन अभी के हालात मे शोषित और गरीब तबको के लोगो के उच्च शिक्षा में घुसने का ये आखिरी दरवाज़ा बंद किया जा रहा है और पढे-लिखे लोग इस पर तालिया बजा रहे हैं. जबकि जरूरत है कि हर कालेज की फीस कम करने के लिये आंदोलन हो, शिक्षा और स्वास्थ्य हमारा मूलभूत अधिकार है और कारपोरेट को टैक्स छूट, विज्ञापन और मूर्तियो-मंदिरो की तुलना में कम खर्च में ही सभी को मुहैया कराना सम्भव है.

I was just thinking about what a university means and then I remembered Stoner. This book by John Williams is an account of what it means to be an academic and spending your life at the university. An incredibly painful and sad story of a poor farmer's son who finds literary studies and lives his difficult life just trying to do what he enjoys.

@Strev I liked Parasite. More than the highlighted theme of class, I think it was the subtle and underlying critique of a kind of technical dystopian capitalist consumerism that I found interesting.

I once read a story about crabs. If put in a deep container, instead of climbing up they'd pull each other down. This is response of India's whataboutery population after hearing about JNU. Instead of talking about more universities affordable, they want to make JNU unaffordable. They are angry about how could they get a degree for thousands when our children spent lakhs. Not angry with the system that they had to spend lakhs when they could've got it for thousands. Typical crab behavior.

छात्रों के आंदोलन को तोड़ने के लिए खाना बंद करने की धमकी। हिटलर भी यह देखकर बोलता ये तो मुझसे भी ज़्यादा गिरे हुए लोग हैं।

#jnuprotest

At the current moment, I feel compelled to write why JNU stands, why I love the space despite having criticized it on multiple account. I have now been part of JNU for 7 years, starting from my masters. I grew up in the way I looked at the world, it really helped me breathe the air of freedom. After my master's, I received the news that I had Cancer, as scary as it was I didn't want life to stop. I sat for the MPhil exam in the middle of my chemotherapy, and cleared.

Show more
Mastodon

Server run by the main developers of the project 🐘 It is not focused on any particular niche interest - everyone is welcome as long as you follow our code of conduct!